क्षमा धर्म का सार
क्षमा धर्म का सार - बालकवि बैरागीइन दिनों जैन समाज के, दिगम्बर सम्प्रदाय का पर्यूषण-पर्व चल रहा है। नीमच के दैनिक ‘नई विधा’के लिए...
View Articleमारो गोली अपनी महक को
दादा श्री बालकवि बैरागी की यह कविता भी मुझे पहली बार देखने/पढ़ने को मिली। उनकी बिखरी हुई, असंग्रहित रचनाओं की मेरी तलाश को जिस आत्मीयता और चिन्ता से मदद मिल रही है, वह मुझे विगलित कर देती है। यहाँ...
View Articleरोपणी का रोना
2005 में लिख दिया था 2026 का सच। दादा श्री बालकवि बैरागी की बिखरी हुई, असंग्रहित रचनाओं की मेरी तलाश को जिस आत्मीयता और चिन्ता से मदद मिल रही है, वह मुझे विगलित कर देती है।...
View Article2017 में प्रकाशित, मरणोपरान्त मिली, ‘ताजा गजल’
फेस बुक पर मेरे बने रहने के बड़े कारणों में से एक है - दादा श्री बालकवि बैरागी की, असंग्रहित, बिखरी हुई रचनाओं की तलाश। दादा की कई रचनाएँ मुझे फेस बुक से ही मिलीं। इसी बहाने, दादा के अनेक प्रशंसकों से...
View Articleचम्बल इलाके का अद्भुत उन्माद ‘खुईया’
किसी जमाने में इन्दौर से प्रकाशित होते रहे दैनिक ‘चेतना’के 10 मार्च 1998 के अंक में प्रकाशित, दादा श्री बालकवि बैरागी का यह लेख मुझे मन्दसौर के ख्यात इतिहासवेत्ता-पुरातत्ववेत्ता डॉक्टर श्री...
View Articleइस त्याग-पत्र को, आज क्या कहेंगे?
(‘भाई साहब’ के दामाद, मेरे पुराने कृपालु श्री भारत भूषण शुक्ला ने ‘श्री श्यामसुन्दर पाटीदार स्मृति ग्रन्थ’ की प्रति दी। उसी से इस घटना का पहला, बहुत बारीक धागा मिला। उससे मैंने अपनी यादों के कोठार की...
View Article1988 में वेनिटी बेग वाली अशिक्षित, अनपढ़ आदिवासी सरपंच
लगता है, दादा श्री बालकवि बैरागीके, इधर-उधर बिखरे हुए लिखे को जुटाने में मेरी हर कोशिश अपने-आप में एक संस्मरण बन जाएगी।देश के ख्यात इतिहासवेत्ता और पुरातत्ववेत्ता मन्दसौरवाले डॉ. श्री कैलाश चन्द्रजी...
View Articleदशपुर जनपद के शैलाश्रय: मिट्टी के ये रंग हजारों वर्ष पुराने हैं
दशपुर जनपद (‘दशपुर’ यानी मध्य प्रदेश के जिला मुख्यालय वाला शहर मन्दसौर) के शैलाश्रयों पर केन्द्रित, दादा श्री बालकवि बैरागी का यह लेख मुझे अचानक ही मिला। मुमकिन है, लेख मिलने की कथा, मूल लेख से बड़ी हो...
View Articleसूरज के राजदूत
मुमकिन है, आज की पीढ़ी पं. सूर्यनारायणजी व्यासको और उनके बारे में कुछ नहीं जानती हो। उनके बारे में जितना भी कहा जाए, बहुत-बहुत कम होता है। वे भारतीय ज्योतिष शास्त्र के श्रेष्ठ साधक, श्रेष्ठ ज्ञाता थे।...
View Articleहमारा कृष्ण तो वहीं, कहीं....
बहुत लम्बा/बड़ा है दादा श्री बालकवि बैरागी का यह लेख। किन्तु मुझे आकण्ठ विश्वास है कि आपने यदि पढ़ना शुरू कर दिया तो अन्तिम शब्द तक पढ़ने के बाद ही अगली साँस ले पाएँगे। दादा की कविताओं और गद्य में एक...
View Articleअपनी-अपनी रेपुटेशन है
दादा श्री बालकवि बैरागी के लेखन का यह रंग भी है।साप्ताहिक धर्मयुगके, 4 मई 1980 के अंक के पृष्ठ 41 पर प्रकाशित यह कतरन, वर्तमान में आदीपुर (कच्छ-गुजरात) में रह रहे प्रिय विवेक मेहताने यह कतरन भेजी...
View Articleनन्दराम से बालकवि तक
(अपनी आयु के 60 वर्ष पूरे करने के प्रसंग पर बकलम खुद)दादा श्री बालकवि बैरागी की आज छियानवेवीं जन्म तारीख और पिच्यानवेवी जन्म वर्ष-गाँठ है। दादा हम सबके बीच होते तो आज अपनी उम्र के 96वें बरस में प्रवेश...
View Articleबालकवि की ललकार और महाकवि का मर्म
श्री बालकवि बैरागी और डॉ. शिव चौरसियाडॉ. विवेक चौरसियाआज दादा श्री बालकवि बैरागीकी 94वीं वर्ष-गाँठ है। दादा होते तो आज अपने जीवन के 95वें वर्ष में प्रवेश कर रहे होते। यह लेख, उनके जीवित रहते, उनकी...
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महाकाल के महाशय- बालकवि बैरागीपुण्य-स्मृति पण्डित श्री सूर्यनारायणजी व्यासकी पुण्य-तिथि ( 22 जून 1999) प्रसंग पर लिखा, दादा श्री बालकवि बैरागी का यह लेख, इन्दौर से प्रकाशित दैनिक नव भारत...
View Articleमालवा की सुवास - श्रीनिवास
मालवी की मिठास को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में श्री बालकवि बैरागी का अवदान उल्लेखनीय है। साहित्य के दौर में ‘मालवी के मणके’ पिरोते हुए श्री बालकवि बैरागी ने सार्थक, सटीक और सरल लेखन सिरजा है।...
View Articleस्पष्टीकरण
मालवा के एक प्रसिद्ध साहित्यकार हुए हैं - श्री मंगल मेहता। मालवांचल और मालवी बोली उनके रोम-रोम में बसी हुई थी। मालवा और मालवी पर उन्होंने न केवल अपने सामर्थ्य और क्षमता से अधिक काम किया, मालवांचल के...
View Article...और अब अश्वगन्धा
वाणिज्यिक-औषधीय कृषोपज ‘अश्वगन्धा’को लेकर दादा श्री बालकवि बैरागीका यह लेख, ‘आधारभूत लेख’ की श्रेणी में शामिल किए जाने की पात्रता रखता है। यह लेख, कोटा (राजस्थान) के स्थापित, जाने-माने पत्रकार प्रिय...
View Articleदादा की राज्य सभा सदस्यता: राजीवजी का वादा सोनियाजी ने निभाया
दादा श्री बालकवि बैरागी देश के उन गिनती के लोगों में शामिल हैं जो तीनों विधायी सदनों (विधान सभा, लोक सभा और राज्य सभा) के सदस्य रहे। विधान सभा के सदस्य दो बार (1967 से 1972 और 1980 से 1984) रहे और...
View Articleजब बैरागीजी को थाने में कविता सुनानी पड़ी
बी. एल. पावेचासन् 1965 में मेरा तबादला, सिविल जज मनासा के पद पर हुआ। तब तक बैरागीजी देश के अच्छे कवि के रूप में स्थापित हो चुके थे और वे मेरे लिए सम्माननीय हो चुके थे। मनासा में नौकरी ज्वाइन करने के...
View Articleक्या हमारे गाँव चिड़चिड़े हो गए हैं?
बालकवि बैरागी(दादा का यह लेख, इन्दौर से प्रकाशित हो रहे दैनिक नईदुनियाके, वर्ष 1993 के दीपावली विशेषांक में, पृष्ठ 16-17 पर छपा था। इसे क्या कहा जाए कि तीस बरस पहले लिखी बातें, आज की बातें लगती हैं।...
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